गाजियाबाद : अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर गाजियाबाद के रईसपुर गांव से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो शिक्षा के महत्व को नए आयाम दे रही है। गांव के युवा समाजसेवी सुरविंदर किसान ने “दादा-दादी स्कूल” की शुरुआत कर बुजुर्गों को अक्षर ज्ञान सिखाने का बीड़ा उठाया है। इस अनूठी पहल ने न केवल गांव की तस्वीर बदली, बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल कायम की है।
बुजुर्गों की अधूरी ख्वाहिशें हुईं पूरी
70-80 साल की उम्र में गांव के बुजुर्ग अब किताबें और कॉपियां थामकर अपने सपनों को साकार कर रहे हैं। रामप्यारी दादी बताती हैं, “पहले पोता होमवर्क पूछता था, तो मैं चुप रहती थी। अब मैं उसे पढ़ाती हूं और कहती हूं, चलो बेटा, साथ पढ़ते हैं।” वहीं, शांति देवी जो पहले अखबार की तस्वीरें ही देख पाती थीं, अब गर्व से हेडलाइन पढ़ती हैं। उनकी मुस्कान इस बात का सबूत है कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती।
एक क्रांतिकारी कदम
सुरविंदर किसान का यह प्रयास सिर्फ अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह पहल बुजुर्गों में आत्मविश्वास जगाने के साथ-साथ समाज को यह संदेश दे रही है कि शिक्षा का दीपक कभी भी जलाया जा सकता है। इस स्कूल ने साबित किया है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और जब बुजुर्ग पढ़ते हैं, तो पूरा समाज नई रोशनी से जगमगाता है।
गांव से विश्व तक प्रेरणा
रईसपुर की यह कहानी अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रही। सुरविंदर किसान ने दिखाया कि मजबूत इरादों के साथ बदलाव की शुरुआत कहीं से भी हो सकती है। उनकी यह पहल पूरे भारत के लिए एक प्रेरणा बन रही है, जो यह सिखाती है कि शिक्षा हर किसी का अधिकार है। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर रईसपुर की यह कहानी दुनिया को यह संदेश देती है कि अगर 80 साल की दादी पढ़ सकती हैं, तो कोई भी पढ़ सकता है। सुरविंदर किसान और उनके “दादा-दादी स्कूल” को सलाम, जिन्होंने ज्ञान का दीपक जलाकर समाज को नई दिशा दिखाई। यह कहानी बताती है कि जब एक गांव बदलता है, तो दुनिया बदलने की राह पर चल पड़ती है।



