
बिहार से विलुप्त होती जा रहीं है होली पर गाए जाने वाली पारंपरिक गीत इसके साथ ही साथ सामाजिक समरसता और भाईचारे का माहौल भी नहीं दिखता।
रंगों का पर्व होली भी शहरीकरण से अछूता नहीं है। वसंत पंचमी से ही रंग और अबीर की शुरुआत हो जाती है। वसंत की मादकता पक्षी को भी रिझा लेते हैं। कोयल की सुरीली आवाज़ कू कू सुनाई देने लगती है। होली से सामाजिक भाईचारा पुनः जागृत हो जाती थी। सभी एक दूसरे के गले लगने लगते थे। बिहार की पारंपरिक होली गीत फाग, जोगिरा, चैता भी आधुनिकतावाद से अछूती नहीं रही।
सिवान (बिहार) के गौरा गांव के निवासी शत्रुध्न सिंह (75) बताते हैं की जो 80-90 के दशक में होली की रौनक थी अब वो विलुप्त होते जा रहीं है। पहले की तरह अब होली नहीं मनाई जाती है। अब समाज में विकृति आ गई है। जब हम बच्चे थे तो अगजा के लिए घर – घर जा कर उपला (गोइठा) जमा करते थे लेकिन आज की पीढ़ी लगभग इस परंपरा से अनभिज्ञ है। हम टोली बना कर फगुआ गाते बजाते बगल के गांव तक जाते थे, लेकिन आज ग्रामीण वाद यंत्र के जगह पर लोग डीजे पर नाचते हैं।
इस परंपरा के विलुप्त होने का मुख्य कारण यह भी है कि गाँव में शिक्षा का अभाव, स्किल्स को सीखने का अभाव, टेक्नोलॉजी का अभाव, इन सबके कारण जो बच्चे बढ़ चढ़ कर भाग ले सकते थे, वह बच्चे अच्छी शिक्षा के लिए शहर की योर जा रहें हैं तो वही आज का युवा रोज़गार की तलाश में शहर के तरफ़ पलायन कर रहे हैं। जो आधुनिक समाज को दर्शाता है। लेकिन एक बात यह भी है कि सामाजिक संस्कृति, परंपरा और अपने रीति रिवाजों से कट जाने को हम आधुनिकता का नाम दे दिए हैं।