झूलों, कव्वालियों और मन्नतों का मेला: मुरादनगर का 359 साल पुराना उर्स उत्सव
रिपोर्ट : हैदर खान
मुरादनगर का उर्स मेला, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है, 359 सालों से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम कर रहा है। हजरत मोहम्मद मुराद गाजी की दरगाह पर आयोजित यह मेला न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक जीवंत उत्सव भी है। झूलों की सैर, चाट-पकौड़ियों का स्वाद और कव्वालियों की महफिल के साथ यह मेला आज भी लोगों के दिलों में बस्ता है। मॉल कल्चर के दौर में भी इस मेले का क्रेज कम नहीं हुआ, और बच्चे-बुजुर्ग सभी इसकी रौनक में खो जाते हैं।
सांप्रदायिक सौहार्द का ऐतिहासिक सफर
ईदगाह रोड पर बाबा मुराद गाजी की दरगाह पर होने वाला यह मेला 17वीं सदी से अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए है। मेला कमेटी के प्रभारी एडवोकेट नाजिम पठान बताते हैं, “मेले की शुरुआत हिंदू समुदाय ने चंदा इकट्ठा करके की थी, और आज तक इसका अध्यक्ष हिंदू समाज से ही चुना जाता है।” मुस्लिम समुदाय का भी पूरा सहयोग इस मेले को खास बनाता है। यह परंपरा मुरादनगर को देशभर में सांप्रदायिक एकता की मिसाल बनाती है।
मेले का क्रेज: पुरानी यादें, नया जोश
70 वर्षीय मास्टर बाबू खान पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, “पहले तांगे-बुग्गी से लोग मेला देखने आते थे। मोहल्ले की महिलाएं गुट बनाकर मेले का मजा लेती थीं।” आज भी झूलों, चटपटी चाट और अनूठी दुकानों की रौनक मेले को खास बनाती है। रिश्तेदारों से लेकर स्थानीय लोगों तक, सभी सालभर इस मेले का इंतजार करते हैं।
आस्था का केंद्र: मन्नतों की दरगाह
बाबा की दरगाह पर चादर चढ़ाने और मन्नत मांगने वालों की भीड़ मेले का मुख्य आकर्षण है। मान्यता है कि सच्चे दिल से मांगी गई मुरादें जरूर पूरी होती हैं। मेले में राष्ट्रीय स्तर की कव्वालियां,कवि सम्मेलन और मुशायरे भी आयोजित होते हैं, जो इसे सांस्कृतिक रूप से और समृद्ध बनाते हैं।
हिंदू-मुस्लिम सहयोग: मेले की ताकत
मेला कमेटी के व्यवस्थापक हामिद खान कहते हैं, “हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय मिलकर मेले को सफल बनाते हैं। कव्वालियों का मुकाबला और सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों को दूर-दूर से खींच लाते हैं।” यह सहयोग मेले को सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बनाता है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
मेला कमेटी हर साल इसे और आकर्षक बनाने के लिए नए प्रयोग करती है। आधुनिकता के दौर में भी मेले की परंपराएं जीवित हैं, जो हर उम्र के लोगों को लुभाती हैं। मॉल कल्चर भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन मेले की रौनक और आस्था आज भी बरकरार है।
इसलिए खास है यह मेला
मुरादनगर का उर्स मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि 359 साल पुरानी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत है। यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगी।



