टेक्नोलॉजी – Nation News 18 https://nationnews18.com Latest and Breaking News Thu, 01 Jun 2023 02:57:23 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://nationnews18.com/wp-content/uploads/2024/09/cropped-images-7-32x32.png टेक्नोलॉजी – Nation News 18 https://nationnews18.com 32 32 अगर आप भी अपने बच्चों को देते हैं मोबाइल तो जरूर पढ़ें यह खबर : WHO ने दी परिजनों को चेतावनी https://nationnews18.com/2479/ https://nationnews18.com/2479/#respond Thu, 01 Jun 2023 02:57:23 +0000 https://nationnews18.com/?p=2479 नोएडा : दुनिया में टेक्नोलॉजी (Technology)का भूत इस कदर चल गया है कि लोग अपने छोटे से छोटे काम को टेक्नोलॉजी के सहारे करते हैं और बिना उसके जीवन व्यतीत करना इस दौर में कठिन सा हो गया। अगर मोबाइल फोन की बात की जाए तो लोग बिना फोन के 1 सेकंड नहीं रह पाते हैं। ऐसे में जब बच्चे रोते हैं या किसी चीज के लिए जिद करते हैं तो अक्सर मां-बाप पीछा छुड़ाने के लिए बच्चे को मोबाइल या कोई और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जमा देते हैं। यह आजकल काफी आम हो गया है इससे बच्चा शांत हो तो जाता है, लेकिन इससे उसे कई घंटों तक स्क्रीन के सामने बिताने की लत लग जाती है।

*मोबाइल न देने पर आत्महत्या तक कर चुके*

दुनिया भर में हुई तमाम रिसर्च बताती है कि कम उम्र में बच्चों को फोन थामाने से उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है। इतना ही नहीं एक रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल गैजेट और ज्यादा टीवी देखने कि लत बच्चों का भविष्य खराब कर रही है इससे उनमें वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों के लिए यह इतना खतरनाक है कि जिले में ऐसे मामले भी देखे गए हैं जिसमें बच्चों ने फोन न मिलने पर आत्महत्या तक कर ली है।

*क्या है वर्चुअल ओटिज्म*

वर्चुअल ओटिज्म के लक्षण आमतौर पर 4 से 5 साल तक की उम्र के बच्चों में देखते हैं। ऐसा अक्सर उनके मोबाइल फोन टीवी और कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट कि लत के कारण होता है। स्मार्टफोन का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग लैपटॉप और टीवी पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों को बोलने में दिक्कत और समाज में दूसरे लोगों के साथ बातचीत करने में परेशानी महसूस होने लगती है।

*फोन दो तभी खाना खाऊंगा*

टेक्नोलॉजी के इस दौर में में बच्चे हो या बड़े सभी फोन की लत से प्रभावित है। छोटे मासूम बच्चे भले ही फोन ना चलाएं लेकिन उनका रोना चुप कराने के लिए उनके परिवार वाले फोन पकड़वा देते हैं। फोन खिलौने की तौर पर बच्चे का मनोरंजन करता है जिससे देखते-देखते बच्चा उसका आदी हो जाता है।

*इतने बच्चे कर रहे मोबाइल का इस्तमाल*

एक सर्वे के मुताबिक पाया गया कि भारत में 10 से 14 वर्ष के 83% बच्चे स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं। 15 साल से ज्यादा उम्र के 88% बच्चे स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं. जबकि इंटरनेशनल औसत की बात करें तो वो 76% है।

*WHO ने जारी रिपोर्ट में कही यह बड़ी बात*

विश्व स्वास्थ संगठन यानी (World Health Organization) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम निर्धारित कर दिया है। अब तक लोगों का सिर्फ ये मानना था कि स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से आंखें खराब होती हैं। लेकिन, डब्ल्यूएचओ (WHO) की इस रिपोर्ट के मुताबिक, इसके परिणाम ज्यादा खतरनाक हैं। 5 साल से कम उम्र के बच्चों का निर्धारित समय से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके शारिरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डालता है। इस रिपोर्ट के जरिए WHO ने माता-पिता या अभिभावक को बच्चों को मोबाइल फोन, टीवी स्क्रीन, लैपटॉप और अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रखने की चेतवानी दी है।

*कैसे रखे बच्चों को फोन से दूर*

अगर आपका बच्चा भी अक्सर मोबाइल से चिपका रहता है तो आपको सतर्क होने की आवश्यकता है। दरअसल मोबाइल का अधिक यूज आपके बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार बच्चों के डिप्रेशन चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव का कारण मोबाइल फोन हो गया है।

1. कम उम्र में मोबाइल फोन ना दे
2. वाईफाई बंद रखें
3. अपने बच्चे को क्वालिटी फैमिली टाइम दे
4. स्क्रीन टाइम लिमिट रखें
5. मोबाइल पासवर्ड का प्रयोग करें
6. बच्चे को बाहर खेलने (outdoor sports) के लिए प्रोत्साहित करें

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जयपुर से दिल्ली:वंदे भारत ट्रेन के बारे में वह सब जानकारी जो आप जानना चाहते हैं https://nationnews18.com/2234/ https://nationnews18.com/2234/#respond Fri, 14 Apr 2023 07:49:56 +0000 https://nationnews18.com/?p=2234 हाल ही में राजस्थान को पहली हाई स्पीड ट्रेन मिल गई। राजस्थान और देश की पहली ट्रेन जो सैटेलाइट से चलेगी, ने वंदे भारत ने बुधवार को जयपुर से दिल्ली का पहला सफर तय किया। ट्रेन सप्ताह में 6 दिन जयपुर, अलवर और गुड़गांव होते हुए राजस्थान के अजमेर और दिल्ली कैंट के बीच दौड़ेगी।

बुधवार को ट्रेन ने जयपुर से दिल्ली कैंट तक का 300 किलोमीटर का सफर 4 घंटे 50 मिनट में तय किया। पीएम नरेंद्र मोदी ने वर्चुअली उद्घाटन कार्यक्रम में सुबह ठीक 11.30 बजे ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर जयपुर से रवाना किया। दोपहर 4 बजकर 20 मिनट पर ट्रेन दिल्ली कैंट स्टेशन पर पहुंची। 

खास विशेषताए – इस रेलसेवा में 12 वातानुकुलित चेयरकार, दो वातानुकुलित एक्जीक्यिूटिव चेयरकार और दो ड्राइविंग कार श्रेणी के डिब्बों सहित कुल 16 डिब्बे होंगे।इनमें से 2 एग्जीक्यूटिव कोच और 14 कोच नॉर्मल एसी चेयरकार है। 14 चेयरकार कोच में सीट 180 डिग्री तक ही बैक हो सकती है। वहीं 2 एग्जीक्यूटिव कोच की सीट 360 डिग्री तक घूम सकती है। ट्रेन में एक भी स्लीपर कोच नहीं है, लेकिन चेयरकार कोच में सीटों के 180 डिग्री तक फोल्ड होने के कारण आराम से नींद भी ले सकते हैं। पूरी ट्रेन में कुल 1128 यात्री बैठ सकते हैं। इनमें से 2 एग्जीक्यूटिव कोच और 14 कोच नॉर्मल एसी चेयरकार है। 14 चेयरकार कोच में सीट 180 डिग्री तक ही बैक हो सकती है। वहीं 2 एग्जीक्यूटिव कोच की सीट 360 डिग्री तक घूम सकती है। ट्रेन में एक भी स्लीपर कोच नहीं है, लेकिन चेयरकार कोच में सीटों के 180 डिग्री तक फोल्ड होने के कारण आराम से नींद भी ले सकते हैं। पूरी ट्रेन में कुल 1128 यात्री बैठ सकते हैं।

दावा है कि यह देश की सबसे सुरक्षित ट्रेन होगी क्योंकि ये सैटेलाइट से कंट्रोल होती है। सामने से कोई दूसरी ट्रेन आएगी तो सैटेलाइट से ऑटोमैटिक ब्रेक लग जाएंगे। वहीं 180 किमी प्रति घंटे की स्पीड के साथ यह देश की सबसे तेज रफ्तार वाली ट्रेन है। हालांकि अभी इसे 110 किमी/ घंटे की स्पीड से चलाया जा रहा है।

देश में पहली बार टीसीएएस(TCAS)टेक्निक इस्तेमाल – जयपुर से दिल्ली तक चल रही वंदे भारत ट्रेन के इंजन में पहली बार ट्रेन कलिजन अवॉइडेंस सिस्टम (टीसीएएस) टेक्निक काम में ली गई है। इसे ‘कवच ‘ नाम दिया गया है। टीसीएएस तकनीक सैटेलाइट से ऑपरेट होती है। इससे ट्रेनें कभी भी लाल सिग्नल पार नहीं करेगी। मेक इन इंडिया के तहत रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड आर्गेनाइजेशन (आरडीएसओ) ने इसे विकसित किया है। इस ट्रेन के सामने कोई ट्रेन आने और पायलट के कोहरे के कारण रेड सिग्नल नहीं देख पाने पर भी सैटेलाइट से रेडियो कम्युनिकेशन के माध्यम से ट्रेन के ऑटोमैटिक ब्रेक लग जाएंगे।

 कोच कनेक्टिंग डोर स्लाडर पैटर्न पर खुलते और बंद होते हैं, जो सेंसर्ड ऑपरेटिव है जैसा मेट्रो ट्रेन में होता है। एक बार रवाना होने के बाद इसके मेन गेट ट्रेन के पूरी तरह रुकने पर ही खुलेंगे। ट्रेन में जरा भी मूवमेंट हैं तो दरवाजे लॉक ही रहेंगे। ट्रेन की तकनीक और इसमें यूज किए गए सभी पाट्‌र्स मेड इन इंडिया हैं। दरवाजे और व्हील्स इंपोर्टेड हैं।

फ़ूड – मीनू और आइटम पैसेंजर्स की चॉइस पर रहेंगे। टिकट की बुकिंग में फ़ूड ऑर्डर की फेसिलिटी रहेगी।

टेम्प्रेचर – वंदे भारत के हर कोच में टेम्प्रेचर को कंट्रोल करने के लिए कंट्रोल बटन है, जो पैसेंजर सीट से थोड़ा दूर है। इस कंट्रोल बटन से पैसेंजर खुद एसी का टेम्प्रेचर बदल सकते हैं, हालांकि इसकी जरूरत नहीं पड़ती। हर कोच में 3 माइक्रोवेव ओवन जैसे हीट बॉक्स भी है , जहां पैसेंजर्स अपना खाना भी गर्म कर सकते हैं। इतना ही नहीं इसी के साथ एक बड़ा फ्रीजर भी मौजूद है, जहां पैसेंजर्स अपनी ड्रिंक को ठंडी भी कर पाएंगे। फ्रीजर और ओवन की मॉनिटरिंग पेंट्री स्टाफ के पास मौजूद।

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सोशल मीडिया पर भगवान श्रीराम की AI (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) द्वारा तैयार तस्वीरें हो रही वायरल https://nationnews18.com/2212/ https://nationnews18.com/2212/#respond Wed, 12 Apr 2023 08:30:07 +0000 https://nationnews18.com/?p=2212 सोशल मीडिया पर भगवान श्री राम की AI (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) से बनाई गई तस्वीरें काफी वायरल हो रही हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि जब भगवान राम 21 साल के थे.तब वो ऐसे दिखते थे. तस्वीर में वो मुस्कुराते हुए नजर आ रहे हैं. तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी पसंद की जा रही हैं. तस्वीर शेयर करते हुए ज्यादातर लोग कैप्शन में लिख रहे हैं कि वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस सहित तमाम ग्रंथों में दिए गए विवरणों के अनुसार यह भगवान श्री रामचंद्र जी की AI जनरेटेड फोटो है. वह 21 साल की उम्र में ऐसे दिखा करते थे.

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फ़ेसबुक में क्या सब कुछ ठीक चल रहा है? – दुनिया जहान https://nationnews18.com/1610/ https://nationnews18.com/1610/#respond Mon, 06 Mar 2023 10:56:17 +0000 https://nationnews18.com/?p=1610

यूज़र्स की संख्या के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फ़ेसबुक अक्सर विवादों के घेरे में रहता है.

इंटरनेट सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी के नियमों के उल्लंघन के मामले में अमरीका और यूरोपीय संघ ने इस पर जुर्माना भी लगाया है.

जनवरी 2023 में पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति ने एक महत्वपूर्ण लड़ाई जीती, हालांकि ये चुनावों में मिली जीत नहीं थी.

इस जीत के बाद फ़ेसबुक पर उन पर लगी रोक को हटा दिया गया. दो साल फ़ेसबुक से बाहर रहने के बाद अब वो चाहें तो फिर फ़ेसबुक पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं.

फ़ेसबुक ने पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति को साल 2020 में जो बाइडन से राष्ट्रपति चुनावों में हारने के बाद ब्लॉक कर दिया था. इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति के हज़ारों समर्थकों ने चुनाव के परिणाम बदलने के लिए अमरीकी संसद को घेर लिया और जमकर विरोध प्रदर्शन किया. इस घटना में पांच लोग मारे गए थे.

उस समय फ़ेसबुक ने यह कह कर उन्हें ब्लॉक कर दिया कि उनके बयान से हिंसा भड़की है और उन्हें फ़ेसबुक पर तभी लौटने दिया जाएगा जब फ़ेसबुक इसे लेकर आश्वस्त हो जाएगा कि यहां उनके विचार व्यक्त करने से लोगों की सुरक्षा को ख़तरा नहीं है.

फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाले पूर्व राष्ट्रपति पहले भी कई पोस्ट के लिए विवादों में रहे थे. ऐसे में उन पर लगी रोक हटाने के फ़ेसबुक के फ़ैसले की तीखी आलोचना हुई. हालांकि फ़ेसबुक की भी आलोचना पहली बार हुई हो ऐसा नहीं है. दुनिया की एक चौथाई आबादी रोज़ाना फ़ेसबुक का इस्तेमाल करती है और ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अक्सर विवादों के घेरे में रहता है.

रोज़मर्रा की सरगर्मी

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में टेक्नॉलॉजी और मीडिया संबंधी विषय की वरिष्ठ शोधकर्ता और मीडिया विशेषज्ञ ज्यूदित डोनथ बताती हैं कि फ़ेसबुक से पहले भी कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म थे.

वो कहती हैं, “हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पांच छात्रों ने सोशल मीडिया में नाटकीय बदलाव लाने वाले फ़ेसबुक लॉन्च किया था. इसकी शुरुआत ऐसे हुई कि वहां पढ़ने वाले छात्रों की जानकारी के बारे में एक पेपर डायरेक्टरी होती थी जिसमें छात्रों के फ़ोटो और बायोडेटा होता था. इस डायरेक्टरी का नाम था- फ़ेसबुक. इन छात्रों ने वही नाम अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म के लिए चुना.”

वो कहती हैं, “पेपर डायरेक्टरी में लोगों को ढूंढना मुश्किल होता था और उस पर आप कमेंट भी नहीं कर सकते थे. उन्होंने एक ऐसा प्लेटफार्म बनाने की कोशिश की जिसमें लोगों को ढूंढना आसान था. कंप्यूटर साइंस और मनोविज्ञान के छात्र मार्क ज़करबर्ग फ़ेसबुक बनाने वाले छात्रों में से एक थे. इसे लेकर उनके पास बड़ी योजना थी.”

फ़ेसबुक के सफ़र के बारे में ज्यूदित डोनथ कहती हैं, “शुरुआत उन्होंने यूनिवर्सिटी से की लेकिन बाद में इसे दूसरे विश्विद्यालयों में भी शुरू किया गया. यह ऐसी चीज़ थी कि जितने ज़्यादा लोग इससे जुड़ेंगे यह उतनी ही अधिक फ़ायदेमंद होगी. दूसरी यूनिवर्सिटी के छात्र इससे जुड़े, उनके अपने दोस्त और नेटवर्क थे फिर उसमें उनके रिश्तेदार भी जुड़ गये और यह नेटवर्क फैलता चला गया.”

2006 में फ़ेसबुक एक बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफार्म बन गया जो दूसरों को टक्कर देने लगा.

उस समय मायस्पेस और फ़्रेंडस्टर जैसे दूसरे भी लोकप्रिय और बड़े सोशल मीडिया नेटवर्क थे जहां लोग अपने परिचितों की प्रोफ़ाइल देख सकते थे और उनके दोस्तों के बारे में जान सकते थे.

लेकिन वो ‘स्टैटिक’ वेबसाइट थे, वहां कुछ बदलाव नहीं होता था. इसलिए फ़ेसबुक ने इसे बदलने के लिए अपने प्लेटफार्म पर न्यूज़फ़ीड का फ़ीचर लांच किया.

वीडियो कैप्शन,पाकिस्तान में फ़ेसबुक पर बढ़ रहा है दबाव

ज्यूदित डोनथ कहती हैं, “फ़ेसबुक ने इसकी शुरुआत की. अब लोग अपनी रोज़मर्रा की गतिविधि के बारे में दूसरों को बता सकते थे. उनकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है. वो कहां जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं. इससे उनके इर्दगिर्द उनके दोस्तों के नेटवर्क में एक सरगर्मी शुरु हो गई.”

अब ज़्यादातर लोग ऐसा करने के बारे में दो बार नहीं सोचते. लेकिन जब यह पहली बार शुरु हुआ तो लोगों के लिए यह बहुत नई बात थी.

ज्यूदित डोनथ का मानना है कि मार्क ज़करबर्ग ने फ़ेसबुक के शुरुआती डिज़ाइन को बनाते समय यह भांप लिया था कि लोग एक-दूसरे के बारे में जानने के लिए काफ़ी उत्सुक होते हैं, यही उनका कॉनसेप्ट था.

इसके बारे में वो कहती हैं कि ‘कांटेक्ट कोओप्ट’ एक अवधारणा है जिसका मतलब है कि हम केवल अपने दोस्तों के बारे में ही नहीं बल्कि उनके भी दोस्तों के बारे में भी जानने लगते हैं.

कई बार हम एक बात जो एक ख़ास व्यक्ति से कहना चाहते हैं वो औरों से नहीं कहते. लेकिन फ़ेसबुक पर कही बात अब एक बड़े नेटवर्क तक पहुंच रही थी. इससे जानकारी देने के तरीके के साथ-साथ आपसी संबंधों के समीकरण भी बदलने लगे.

ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बेहद तेज़ी से सफल हुआ. चार साल में फ़ेसबुक ने मायस्पेस को पीछे छोड़ दिया. बाद में कई और सोशल नेटवर्किंग साइट आईं लेकिन फ़ेसबुक फिर भी नंबर वन पर रहा.

जनवरी मे फ़ेसबुक की चौथी तिमाही के नतीजे सामने आए जिससे पता चला उसके यूज़र्स की संख्या तीन करोड़ नब्बे लाख से बढ़ गई थी. यानी दो अरब लोग रोज़ फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन एक बड़ा सवाल ये है कि फ़ेसबुक की कमाई कैसे होती है?

मार्क ज़करबर्ग और डस्टिन मॉस्कोवित्ज़

इमेज स्रोत,JUSTINE HUNT/THE BOSTON GLOBE VIA GETTY IMAGES

इमेज कैप्शन,फ़ेसबुक के सह-संस्थापक मार्क ज़करबर्ग और डस्टिन मॉस्कोवित्ज़

क्लिक के बदले में कैश

फ़ेसबुक की मिलकियत फ़ेसबुक नाम की कंपनी के पास थी. लेकिन 2021 में इस कंपनी का नाम बदल कर मेटा प्लेटफ़ॉर्म यानी मेटा कर दिया गया.

इसके व्यापार के बारे में बीबीसी ने ब्रिटेन की कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी विभाग में वरिष्ठ शोधकर्तो डॉक्टर मर्लिन कोमोरोवस्की से बात की.

वो कहती हैं, “इसका मुख्य कारोबार विज्ञापन या एडवर्टाइज़िंग है. इसकी 98 प्रतिशत कमाई एडवर्टाइज़िंग से ही होती है. शुरुआत से ही इसे विज्ञापन की रणनीति के आधार पर बनाया गया था. हम जो समय फ़ेसबुक पर बिताते है उसी से इसकी कमाई होती है.”

लोग फ़ेसबुक पर विज्ञापन देते हैं और देखते हैं. लेकिन मेटा ने कई सोशल नेटवर्किंग साइट जैसे कि व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम को ख़रीद लिया है.

डॉक्टर मर्लिन कहती हैं, “यह सभी कंपनियां अपने सोशल मीडिया यूज़र्स के बारे में जानकारी इकठ्ठा करती हैं. मिसाल के तौर पर कई वेबसाइट पर रजिस्टर करने के लिए आप अपने फ़ेसबुक अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं. यह जानकारी विज्ञापनों के प्रभावी इस्तेमाल में काम आती है. विज्ञापन देने वाली कंपनियां अपने उपभोक्ताओं की ज़रूरत के हिसाब से इन वेबसाइट पर विज्ञापन देती हैं. और इसके लिए वो फ़ेसबुक को पैसे देती हैं.”

वो कहती हैं, “फ़ेसबुक पर कंपनियों के विज्ञापन देखकर लोग उस कंपनी की वेबसाइट पर जाते हैं और चीज़ें ख़रीदते हैं. इन विज्ञापनों पर जितने ज़्यादा लोग क्लिक करते हैं फ़ेसबुक को उतने ज़्यादा पैसे मिलते हैं. यानी अगर रोज़ाना कम लोग फ़ेसबुक पर साइन-इन करें तो उसकी कमाई भी कम होती है.”

वीडियो कैप्शन,फ़ेसबुक से कैसे चोरी हो रहा है आपका निजी डेटा?

फे़सबुक की पेरेंट कंपनी मेटा

इमेज स्रोत,GETTY IMAGES

उतार चढ़ाव

2022 में लगातार तीन तिमाहियों तक फ़ेसबुक की कमाई गिरती गई थी. लेकिन चौथी तिमाही में इसकी कमाई 32 अरब डॉलर हुई जो विश्लेषकों के अनुमान से बेहतर थी.

फ़ेसबुक ने 2022 में कुल 116 अरब डॉलर कमाए. अरबों लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन 13 से 19 साल की बीच की उम्र के लोग इसे टालते रहते हैं जो भविष्य में इसकी कमाई के लिए बड़ा ख़तरा बन सकता है.

डॉक्टर मर्लिन कहती हैं, “फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाला सबसे बड़ा आयुवर्ग है 25 से 34 साल की उम्र के लोगों का, जो इसके सब्सक्राइबरों का एक चौथाई हिस्सा है. लेकिन बड़ी संख्या में 60 से अधिक की उम्र के लोग भी इसका इस्तेमाल करते हैं. दूसरे सोशल मीडिया के मुक़ाबले इस आयु वर्ग के लोग फ़ेसबक पर सबसे ज़्यादा हैं.”

लेकिन विज्ञापन देने वालों की नज़र में यह अच्छी बात है या बुरी? डॉक्टर मर्लिन समझाती हैं, “यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि एडवर्टाइंज़िंग कंपनी की दिलचस्पी किस आयु वर्ग में है. लेकिन अगर युवा उपभोक्ता आपसे नहीं जुड़ रहे हैं तो भविष्य में आपकी प्रासंगिकता ख़तरे में पड़ सकती है.”

“दूसरी बात यह है कि फ़ेसबुक केवल विज्ञापन से कमाई पर निर्भर है जो कम-ज़्यादा हो सकती है. मिसाल के तौर पर गूगल फ़ोन के साथ-साथ कई तरह की सुविधाएं बेच रही है. कमाई के एकमात्र ज़रिए पर निर्भर रहना थोड़ा मुश्किल है.”

हाल के दिनों में मेटा ने अपनी कंपनी की ब्रैंडिंग बदली है. उसने मेटावर्स में अरबों डॉलर का निवेश किया है. मेटावर्स का मतलब एक ऐसी डिजिटल दुनिया से है जिसमें सीखने, खेलने या जानकारी बांटने के साथ-साथ आप ख़ुद अपने डिजिटल रूप में एकदूसरे से जुड़े होंगे. मगर ऐसा होने में अभी काफ़ी समय लगेगा.

डॉक्टर मर्लिन कहती हैं, “साल 2023 के लिए मेटा का लक्ष्य कंपनी को किफ़ायती बनाने का है इसलिए वो ख़र्च घटा रही है. इसी कारण मार्क ज़करबर्ग ने पिछले साल के अंत में तेरह हज़ार लोगों को नौकरी से निकाल दिया. यह तरीका सही है या नहीं कहना मुश्किल है.”

 

पोस्ट Twitter समाप्त, 1

क़ानून के साथ भी फ़ेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के टकराव की ख़बरें आती रहती हैं. इस बारे में बीबीसी ने न्यूहैंपशर यूनिवर्सिटी के क़ानून विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर टिफ़नी ली से बात की.

प्रोफ़ेसल टिफ़नी मानती हैं कि फ़ेसबुक कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याओं में घिर चुका है.

वो कहती हैं, “मेरे हिसाब से सबसे बड़ा मामला 2018 में केंब्रिज एनालिटिका का था जिसमें कंपनी ने कई थर्ड पार्टी डेवलपर्स को फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वालों की निजी जानकारी का इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी ताकि दूसरी कंपनियां अपने विज्ञापन उन लोगों तक पहुंचा सकें.”

“केंब्रिज एनालिटिका ऐसी ही एक थर्ड पार्टी डेवलेपर थी और उन्होंने इस जानकारी का इस्तेमाल लोगों की अनुमति के बिना और फ़ेसबुक के नियमों के विरुद्ध किया.”

दरअसल केंब्रिज एनालिटिका एक पॉलिटिकल एडवाइज़र कंपनी थी जिसकी सेवाएं 2016 में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार में ली गई थी. ट्रंप यह चुनाव जीत गए थे जिसके बाद 2018 में ये घोटाला सामने आया.

उस वक्त पता चला कि साढ़े आठ करोड़ से अधिक मतदाताओं की जानकारी का इस्तेमाल उनकी अनुमति के बिना चुनाव प्रचार में किया गया था. इसके आधार पर डॉनाल्ड ट्रंप के समर्थकों तक प्रचार संबंधी विज्ञापन पहुंचाए गए थे.

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